मज्झिम निकाय

28. महाहत्थिपदोपम-सुत्तन्त

ऐसा मैने सुना—

एक समय भगवान् श्रावस्ती में अनाथ-पिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

वहाँ आयुष्मान् सारिपुत्र ने भिक्षुओं को संबोधित किया—

“आवुसो! भिक्षुओ!”

“आवुस”—कह, उन भिक्षुओं ने आयुष्मान् सारिपुत्र को उत्तर दिया।

आयुष्मान् सारिपुत्र ने कहा—

“जैसे आवुसो! जंगली प्राणियों के जितने पद हैं, वह सभी हाथी के पैर (= हस्ति-पद) में समा जाते हैं। बडाई में हस्ति-पद उनमें उग्र (= श्रेष्ठ) गिना जाता है। ऐसे ही आवुसो! जितने कुशल धर्म हैं, वह सभी चार आर्य-सत्यों में सम्मिलित हैं। कौन से चारांे में?—दुःख आर्य सत्य में, दुःख-समुदय आर्य-सत्य में, दुःख-निरोध आर्य-सत्य में, और दुःख-निरोध-गामिनी-प्रतिपद् आर्य-सत्य में।

“क्या है आवुसो! दुःख आर्य-सत्य?—जन्म भी दुःख है। जरा (= बुढ़ापा) भी दुःख है। मरण भी दुःख है। शोक, रोना-पिटना, दुःख है। मनःसंताप, परेशनी भी दुःख है। जो इच्छा करके नहीं पाता वह भी दुःख है। संक्षेप में पाँच उपादान-स्कंध दुःख हैं।

“आवुसो! पाँच उपादान-स्कंध कौन से है?—(पाँच उपादान-स्कंध हैं) जैसे कि—रूप-उपादान स्कंध, वेदना ॰, संज्ञा ॰, संस्कार ॰, विज्ञान ॰, । आवुसो! रूप-उपादान-स्कंध क्या है?—चार महाभूत, और चारों महाभूतों को लेकर (बनने वाले) रूप। आवुसो! चार महाभूत कौन से है?—पृथिवी-धातु, आप (= पानी) ॰, तेज (= अग्नि) ॰, वायु ॰। आवुसो! पृथिवी-धातु क्या है?—पृथिवी धातु हैं (दो), आध्यात्मिक (= शरीर में) और बाहरी। आवुसो! आध्यात्मिक पृथिवी-धातु क्या है?—जो शरीर में (= अध्यात्म) हर एक शरीर में कर्कश कठोर (पदार्थ) हैं, जैसे कि—देश, लोभ, नख, दन्त, त्वक् (= चमडा), माँस, स्नायु (= नहारू), अस्थि, अस्थि के भीतर की मज्जा, बुक्क, हृदय, यकृत, क्लोमक, प्लीहा, फुफ्फुस, आँत, पतली-आँत, उदर का मल (= करीष)। और भी जो कुछ शरीर में प्रतिशरीर के भीतर कर्कश, कठोर (पदार्थ) गृहीत है। यह आवुसो! आध्यात्मिक पृथिवी-धातु कही जाती है। जोकि आध्यात्मिक पृथिवी धातु है, और जो बाहरी (= बाहिरा) पृथिवी-धातु है, यह पृथिवी धातु ही है। ‘वह यह (पृथिवी) न मेरी है, न यह मैं हूँ, न यह मेरा आत्मा है’ यह यथार्थ से अच्छी प्रकार जानकर देखना चाहये। इस प्रकार इसे यथार्थ से अच्छी प्रकार जानकर देखने से, (दृष्टा) पृथिवी-धातु से निर्वेद (= उदासीनता) को प्राप्त होता है। पृथिवी धातु से चित्त को विरक्त करता है।

“आवुसो! ऐसा भी समय होता है, जब बाहरी पृथिवी-धातु कुपित होती है, उस समय बाहरी पृथिवी धातु अन्तर्धान होती है। (तब) आवुसो! इतनी महान् बाहरी पृथिवी-धातु की भी अनित्यता=क्षय-धर्मता=वि-परिााम-धर्मता जान पडती है। इस क्षुद्र काया का तो क्या (कहना है)? तृष्णा में फँसा (= तण्हुपादिण्ण) जिसे ‘मै’, ‘मेरा’ या ‘मैं हूँ’ (कहता); वही इसकी नहीं होती।

“भिक्षुओ! जब दूसरे आक्रोश=परिहास=रोष=पीडा देते हैं, तो वह समझता है—‘यह उत्पन्न दुःखरूप-वेदना (= ॰ अनुभव) मुझे श्रोत्र के सम्बन्ध (= सस्पर्श) से उत्पन्न हुई है। और यह कारण से (उत्पन्न हुई है) अ-कारण से नहीं। किस कारण से?—स्पर्श के कारण। ‘स्पर्श अ-नित्य है’—यह वह देखता है। ‘वेदना अ-नित्य है’ ॰ ‘संज्ञा अ-नित्य है’ ॰। ‘संस्कार अ-नित्य है’ ॰। ‘विज्ञान अ-नित्य है’ ॰। उसका चित्त धातु (= पृथिवी) रूपी विषय से पृथक्, प्रसन्न (= स्वच्छ), स्थिर; विमुक्त होता है। उस भिक्षु के साथ आवुसो! यदि दूसरे, हाथ के योग (= संस्पर्श) से, ढेले के योग से, दंड के योग से, शस्त्र के योग से अन्-इष्ट=अ-कांत=अ-मनाष (व्यवहार) से बर्ताव करते हैं। वह यह जानता है—कि ‘यह इस प्रकार की काया है, जिससे पाणि-संस्पर्श भी लगते हैं, ढेले के संस्पर्श भी ॰, दंड के संस्पर्श भी ॰, शस्त्र के संस्पर्श भी ॰। भगवान् के क्रकचोपम (= आरा के समान) अववाद (= उपदेश) में कहा है—‘भिक्षुओ! यदि चोर डाकू (= ओचरक=उचक्का) दोनों ओर दस्तेवाले आरे से भी एक एक अंग काटें, वहाँ पर भी जो सनको दुषित करे, वह मेरे शासन (= उपदेश) (के अनुकूल आचरण) करने वाला नहीं है।’ मेरा वीर्य (= उद्योग) चलता रहेगा, विस्मरण-रहित स्मृति मेरी उपस्थित (रहेगी), काया स्थिर (= प्रश्रब्ध) अ-चंचल (= अ-सारद्ध), चित्त समाहित=एकाग्र्र (रहेगा)। चाहे इस काया में पाणि-संस्पर्श हो, ढेला मारना हो, डण्डा पडे, शस्त्र लगे, (कितु) बुद्धों का उपदेश (पूरा) करना ही होगा।’

“आवुसो! उस भिक्षु को, इस प्रकार बुद्ध को याद करते, इस प्रकार धर्म को याद करते, इस प्रकार संघ को याद करते, कुशल-संयुक्त (= निर्मल) उपेक्षा जब नहीं ठहरती। वह उससे उदास होता है, संवेग को प्राप्त होता है—‘अहो! अ-लाभ है मुझे, मुझे लाभ नहीं हुआ; मुझे दुर्लाभ है, सुलाभ नहीं हुआ, जो मुझे इस प्रकार बुद्ध-धर्म-संघ को स्मरण करते कुशल-युक्त उपेक्षा नहीं ठहरती; जैसे कि आवुसो! बहू (= सुणिसा) ससुर को देखकर सविग्न होती है, संवेग को प्राप्त होती है। इसी प्रकार आवुसो! उस भिक्षुको ऐसे बुद्ध-धर्म-संघ (के गुणों) को याद करते कुशल-संयुक्त उपेक्षा नहीं ठहरती, वह उससे ॰ संवेग को प्राप्त (= उदास) होता है—मुझे अलाभ है ॰। आवुसो! उस भिक्षु को यदि इस प्रकार बुद्ध-धर्म-संघ को अनुस्मरण करते कुशल-युक्त उपेक्षा ठहरती है, तो वह उससे सन्तुष्ट होता है। इतने से भी आवुसो! भिक्षु ने बहुत कर लिया।

“क्या है आवुसो! आप-धातु?—आप (= जल)-धातु दो होती है, आध्यात्मिक और बाहरी। आवुसो! आध्यात्मिक आप-धातु क्या है?—जो शरीर में प्रति शरीर में पानी, या पानी का (पदार्थ) है; जैसे कि पित्त, श्लेप्म (= कफ), पीब, लोहू, स्वेद (= पसीना), भेद, अश्रु, वसा (= चर्बी), राल, नासिका-मल, कर्ण-मल (= लसिका), मूत्र और जो कुछ और भी शरीर में पानी या पानी का है। आवुसो! यह आप-धातु कही जाती है। जो आध्यात्मिक आप-धातु है, और जो बाहरी आप-धातु है, यह आप-धातु ही है। ‘यह मेरा नहीं’, ‘यह मैं नहीं’, ‘यह मेरा आत्मा नहीं’—इस प्रकार इसे यथार्थ जानकर, देखना चाहये। इस प्रकार यथार्थतः अच्छी तरह, जानकर, देखकर, आप-धातु से निर्वेद को प्राप्त (= उदास) होता है। आप-धातु से चित्त को विरक्त करता है।

“आवुसो! ऐसा भी समय होता है, जब हकि बाह्य आप-धातु प्रकुपित होती है। वह गाँव को भी, निगम को भी, नगर को भी, जनपद को भी, जनपद-प्रदेश को भी बहा देती है। आवुसो! ऐसा समय होता है, जब महासमुद्र में सौ योजन, दो सौ योजन, सात सौ योजन के भी पानी आते है। आवुसो! सो भी समय होता है, जब महासमुद्र में सात साल, छः ताल, पाँच ताल, चार ताल, तीन ताल, दो ताल, ताल भर भी पानी होता…है। आवुसो! सो समय होता है, जब महासमुद्र में सात पोरिसा (= पुरूष-परिमाण), ॰ पोरिसा भर पानी रह जाता है। ॰ जब महासमुद्र में आध-पारिसा, कमर भर, जाँघ भर, घुट्टी भर पानी ठहरता है। ॰ जब महासमुद्र मं अंगुलि के पोर धोने भर के लिये भी पानी नहीं रह जाता। आवुसो! उस इतनी बडी बाह्य आप-धातु की अनित्यता ॰। ॰। आवुसो! इतने से भी भिक्षु ने बहुत किया।

“आवुसो! तेज-धातु क्या है?—तेज-धातु है आध्यात्मिक और बाह्य। आवुसो! आध्यात्मिक तेज-धातु क्या है?—जो शरीर में प्रतिशरीर तेज (= अग्नि) या तेज का है; जैसे कि—जिससे संतप्त होता है, जर्जरित होता है, परिदग्ध होता है, खाया पीया अच्छी प्रकार हजम होता है; या जो कुछ और भी शरीर में, प्रति-शरीर में, तेज या तेज-विषय है। यह कहा जाता है आवुसो! तेज-धातु। जो यह आध्यात्मिक (= शरीर में की) तेज-धातु है, और जो कि यह बाह्य तेज-धातु है, यह तेज-धातु ही है। ‘न यह मेरी है’, ‘न यह मैं हँू’, ‘न यह मेरा आत्मा है’—इस प्रकार इसे यथार्थ जानकर देखना चाहिये। इस प्रकार इसे यथार्थतः जानकर, देखने से तेज-धातु से निर्वेदको को प्राप्त होता है, तेज-धातु से चित्त को विरक्त करता है। ॰।

“आवुसो! ऐसा समय (भी) होता है, जब बाह्य तेज-धातु कुपित होती है। वह गाँव, निगम, नगर ॰ को भी जलाती है। वह हरियाली महामार्ग (= पन्थन्त), या शैल या पानी (या) भूमि-भाग को प्राप्त हो, आहार न पा बुझ जाती है। आवुसो! ऐसा भी समय होता है, जब कि इसे मुर्गी के पर भर भी, चमडे के छिलके भर भी ढूँढते हैं। आवुसो! उस इतने बडे तेज-धातु की अ-नित्यता ॰। ॰। आवुसो! इतने से भी भिक्षु ने बहुत किया।

“आवुसो! वायु-धातु क्या है?—वायुधातु आध्यात्मिक भी है, बाह्य भी। आध्यात्मिक वायु-धातु कौन है?—जो शरीर में प्रति-शरीर में वायु या वायु का (पदार्थ) है; जैसे कि ऊध्र्वगामी वात, अधोगामी वात (= हवा), कुक्षि (= पेट) के वात, कोठे में रहने वाले वात, अंग प्रत्यंग में अनुसरण करने वाले वात, या आश्वास-प्रश्वास, और जो कुछ और भी ॰। यह आवुसो! आध्यात्मिक वायु-धातु। ॰ कहा जाता है।

“आवुसो! ऐसा समय भी होता है, जब कि बाह्य वायु-धातु कुपित होती है, वह गाँव को भी ॰ उडा ले जाती है। आवुसो! ऐसा समय (भी) होता है, जब ग्रीष्म के पिछले महीने में ताल का पंखा डुलाकर भी हवा को खोजते हैं, ‘आवुसो! इस इतनी बडी वायुधातु ॰। उस भिक्षु को यदि आक्रोश ॰। ॰’ इतने से आवुसो! भिक्षु ने बहुत कर लिया।

“जैसे, आवुसो! काष्ठ, वल्ली, तृण और मृत्तिका से घिरा आकाश घर कहा जाता है; ऐसे ही आवुसो! अस्थि, स्नायु, माँस और चर्म से घिर आकाश, रूप (= मूर्ति=शरीर) कहा जाता है। (जब) आध्यात्मिक (शरीर में की) आँख अ-विकृत होती है, (किन्तु) वाह्य रूप सामने नहीं आते; (तो) उनसे समन्वाहार (= मनसिकार-पूर्वक विषय-ज्ञान) उत्पन्न नहीं होता; उनसे उत्पन्न विज्ञान-भाग प्रादुर्भूत नहीं होता। जब आवुसो! शरीर में की आँख अ-विकृत होती है, बाह्य रूप सामने आते हैं, तो उनसे विषय-ज्ञान उत्पन्न होता है, इस प्रकार उनसे उत्पन्न (स्कन्ध के) विज्ञान-भाग का प्रादुर्भाव होता है।

“जो चक्षु-विज्ञान के साथ का रूप है, वह रूप-उपादान-स्कंध गिना जाता है। जो ॰ वेदना है,

वेदना-उपादान-स्कंध गिना जाता है। ॰ संज्ञा ॰ संज्ञा-उपादान-स्कंध ॰। ॰ संस्कार ॰ संस्कार-उपादान-स्कंध ॰। ॰ विज्ञान ॰ विज्ञान-उपादान-स्कंध ॰। सो इस प्रकार जानता है—इस प्रकार इन पाँचों उपादान-स्कंधो का संग्रह=सन्निपात=समवाय होता है। यह भगवान् ने भी कहा है—‘जो प्रतीत्य-समुत्पाद को देखता (= साक्षात् करता) है; वह धर्म को देखता है; जो धर्म को देखता है, वह प्रतीत्य-सतुत्पाद (= कार्य कारण से सभी चीज़ों की उत्पत्ति) को देखता है। यह प्रतीत्य-समुत्पन्न (= कारण करके उत्पन्न हैं) जो कि यह पाँच उपादान-स्कंध हैं। जो इन पाँच उपादान-स्कंधों में छन्द (= रूचि)=आलय=अनुनय=अध्यवसान है, वहीं दुःख समुदय है। जो इन पाँच उपादान स्कंधो में छन्द राग का हटाना, छोडना है, वह दुःख निरोध है। इतने से भी आवुसो! भिक्षु ने बहुत किया। ॰।

“आवुसो! यदि आध्यात्मिक (= शरीर में का) श्रोत्र अ-विकृत होता है। ॰। ॰घ्राण ॰। ॰ जिह्वा ॰। ॰ काय ॰। ॰ मन ॰। इतने से भी, आवुसो! भिक्षु ने बहुत किया। ॰।”

आयुष्मान् सारिपुत्र ने यह कहा। सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने आयुष्मान् सारिपुत्र के भाषण को अनुमोदित किया।