मज्झिम निकाय

27. चूल-हत्थिपदोपम-सुत्तन्त

ऐसा मैने सुना—

एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथ-पिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे।

उस समय जाणुस्सोणि (= जानुश्रोणि) ब्राह्मण सर्वश्वेत घोडियों के रथ पर सवार हो, मध्याह्न को श्रावस्ती से बाहर जा रहा था। जानुश्रोणि ब्राह्मण ने पिलोतिक परिब्राजक को दूर से ही आते देखा। देखकर पिलोतिक परिब्राजक से यह कहा—

“हन्त! वात्स्यायन (= वच्छायन)! आप मध्याह्न में कहाँ से आ रहे हैं?”

“भो! मैं श्रमण गौतम के पास से आ रहा हूँ।”

“तो आप वात्स्यायन श्रमण गौतम की प्रज्ञा, पाण्डित्य को क्या समझते है? पंडित मानते हैं?”

“मै क्या हूँ, जो श्रमण गौतम को प्रज्ञा-पाडित्य जानूँगा?”

“आप वात्स्यायन उदार (= बड़ी) प्रशंसा द्वारा श्रमण गौतम की प्रशंसा कर रहे हैं?”

“मैं क्या हूँ, और मैं क्या श्रमण गौतम की प्रशंसा करूँगा? प्रशस्त प्रशस्त (ही) हैं। आप गौतम, देव-मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं।”

“आप वात्स्यायन किस कारण से श्रमण गौतम के विषय में इतने अभिप्रसन्न हैं?”

“(जैसे) कोई चतुर नाम-वनिक (= हाथी के जंगल का आदमी) नाग-वन में प्रवेश करे। वह वहाँ बड़े भारी (लंबे-चैड़े) हाथी के पैर (= हस्ति-पद) को देखे। उसको विश्वास हो जाये-अरे, बडा भारी नाग है। इसी प्रकार जब मैने श्रमण गौतम के चार पद देखे, तो विश्वास हो गया—कि (वह) भगवान् सम्यक्-संबंद्ध हैं, भगवान् का धर्म स्वाख्यात है, भगवान् का श्रावक संघ सुप्रतिपन्न (= सुन्दर प्रकार से रास्ते पर लगा) है। कौन से चार?—(1) मैं देखता हूँ, बाल की खाल उतारने वाले, दूसरों से वाद-विवाद किये हुये, निपुण, कोई कोई क्षत्रिय पंडित—मानों प्रज्ञा में स्थित, (तख) से दृष्टिगत (= धारणा में स्थित तत्व) को खंडा-खंडी करते चलते हैं—सुनते हैं—श्रमण गौतम अमुक ग्राम या निगम में आवेगा। वह प्रश्न तैयार करते हैं—‘इस प्रश्न को हम श्रमण गौतम के पास जाकर पूछेंगे। ऐसा हमारे पूछने पर, यदि वह ऐसा उत्तर देगा; तो हम इस प्रकार वाद (= शास्त्रार्थ) रोपेंगे।’ वह सुनते हैं—श्रमण गौतम अमुक ग्राम या निगम में आ गया। वह जहाँ श्रमण गौतम होता है, वहाँ जाते हैं। उनको श्रमण गौतम धार्मिक उपदेश कर दर्शाता है, समादपन, =समुत्तेजन, संप्रशंसन करता है। वह श्रमण गौतम से धार्मिक उपदेश द्वारा संदर्शित, समादपित, समुत्तेजित, संप्रशंसित हो, श्रमण गौतम से प्रश्न भी नहीं पूछते, उसके (साथ) वाद कहाँ से रोपेंगे? बल्कि और भी श्रमण गौतम ही श्रावक (= शिष्य) हो जाते हैं। भो! जब मैंने श्रमण गौतम से यह प्रथम पद देखा, तब मुझे विश्वास हो गया—भगवान् सम्यक् संबुद्ध हैं ॰।

“(2) और फिर भो! मैं देखता हूँ, यहाँ कोई कोई बाल की खाल उतारने वाले, दूसरों से वाद-विवाद में सफल, निपुण ब्राह्मण पण्डित ॰। मैने श्रमण गौतम से यह दूसरा पद देखा।

“(3) ॰ गृहपति (= वैश्य)-पण्डित। ॰ यह तीसरा पद ॰।

“(4) ॰ श्रमण (= प्रब्रजित)-पण्डित ॰। वह श्रमण गौतम के धार्मिक उपदेश द्वारा ॰ समुत्तेजित संप्रशंसित हो, श्रमण गौतम से प्रश्न भी नहीं पूछते, उसके (साथ) वाद कहाँ से रोपेंगे? बल्कि और भी श्रमण गौतम से घर से बेघर (होकर मिलने वाली) प्रब्रज्या के लिये आज्ञा माँगते हैं। उनको श्रमण गौतम प्रब्रजित करता है, उपसम्पन्न करता है। वह वहाँ प्रब्रजित हो, अकेले एकान्तसेवी, प्रमादरहित, तत्पर, आत्म संयमी हो विहार करते, अचिरही में, जिसके लिये कुल-पुत्र घर से बेघर हो, प्रब्रजित होते हैं, उस अनुपम ब्रह्मचर्य-फल को इसी जन्म में स्वयं जान कर, साक्षात् कर, प्राप्त कर, विहरते है। वह ऐसा कहते हैं—‘मन को भो! नाश किया, मन को भो! प्र-नाश किया। हम पहिले अ-श्रमण होते हुये भी ‘हम श्रमण हैं’—दावा करते थे; अ-ब्राह्मण होते हुये भी ‘हम ब्राह्मण हैं’—दावा करते थे। अन्-अर्हत् होते हुये भी ‘हम अर्हत् हैं’—दावा करते थे। अब हम श्रमण हैं, अब हम ब्राह्मण हैं, अब हम अर्हत् हैं।’ श्रमण गौतम में जब इस चैथे पद को देखा, तब मुझे विश्वास हो गया—भगवान् सम्यक् संबुद्ध हैं ॰। भो! मैने जब इन चार पदों को श्रमण गौतम में देखा, तब मुझे विश्वास हो गया ॰।”

ऐसा कहने पर जानुश्रेणी ब्राह्मण ने सर्व-श्वेत घोडी के रथ से उतरकर, एक कंधे पर उत्तरासंग (= चादर) करके, जिधर भगवान् थे उधर अंजलि जोडकर, तीन बार यह उदान कहा—‘नमस्कार है, उस भगवान् अर्हत् सम्यक् संबुद्ध को, ‘ ‘नमस्कार है ॰।’ ‘नमस्कार है ॰।’ क्या मैं कभी किसी समय उन आप गौतम के साथ मिल सकूँगा? क्या कभी कोई कथा-संलाप हो सकेगा?’

तब जानुश्रोणि ब्राह्मण जहाँ भगवान् थे, वहाँ गया। जाकर भगवान् के साथ ॰ संमोदन कर (कुशलप्रश्न पूछ) एक ओर बैठ गया। एक ओर बैठे हुये जानु-श्रोणि ब्राह्मण ने, जो कुछ पिलोतिक परिब्राजक के साथ कथा-संलाप हुआ था, सब भगवान् से कह दिया। ऐसा कहने पर भगवान् ने जानु-श्रोणि ब्राह्मण से कहा—

“ब्राह्मण! इतने (ही) विस्तार से हस्ति-पद-उपमा परिपूर्ण नहंी होती। ब्राह्मण! जिस प्रकार के विस्तार से हस्ति-पद-उपमा परिपूर्ण होती है, उसे सुनो और मन में (धारण) करो…।”

“अच्छा भो!” कह जानु-श्रोणि ब्राह्मण ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने कहा—“जैसे ब्राह्मण नाम-वनिक नाग-वन में प्रवेश करे। वहाँ पर नाग-वन में वह बड़े भारी ॰ हस्ति-पद को देखे। जो चतुर-नाग-वनिक होता है वह विश्वास नहीं करता—‘अरे! बडा भारी नाग है।’ किसलिये? ब्राह्मण! नाग-वन में वाम की (= धँवनी) नाम की हथिनियाँ भी महा-पदवाली होती हैं, उनका वह पैर हो सकता है। उसके पीछे चलते हुए वह नाम-वन में बडे़ भारी..(लम्बे चैड़े) ..हस्ति-पद और ऊँचे डील को देखता है। जो चतुर नाम-वनिक होता है, वह तब भी विश्वास नहीं करता—‘अरे बडा भारी नाग है।’ किसलिये? ब्राह्मण! नागवन में ऊँची कालारिका नामक हथिनियाँ बड़े पैरों वाली होती हैं, वह उनका पद हो सकता है। वह उसका अनुमान करता है, अनुगमन करते नाग-वन में देखता है—बड़े भारी लम्बे चैड़े हस्ति-पद, ऊँचे डील और ऊँचे दाँतो से आरंचित (प्राणी) को। जो चतुर नाम-वनिक होता है, वह तभी भी विश्वास नहीं करता ॰। सो किसलिये? ब्राह्मण! नाग-वन में ऊँची करेणुका नाम हथिनियाँ महा-पदवाली होती है। वह उनका भी पद हो सकता है। वह उसका अनुगमन करता है। उसका अनुगमन करते नागवन में, बड़े भारी, … (लम्बे-चैड़े) हस्ति-पद, ऊँचे डील, ऊँचे दाँतों से सुशोभित (पाणी), और शाखा को ऊँचे से टूटा देखता है। और वहाँ वृक्ष के नीचे, या चैडे में जाते, खडे, बैठे या लेटे उस नाग को देखता है। वह विश्वास करता है, यही वह महानाग है।

“इसी प्रकार ब्राह्मण यहाँ तथागत, अर्हत् सम्यक्-सम्बुद्ध, विद्या-आचरण-सम्पन्न, सुगत, लोकविद्, अनुत्तर पुरूष-दम्य-सारथी, देव-मनुष्यों के शास्ता, बुद्ध भगवान् लोक में उत्पन्न होते हैं। वह इस देव-मार-ब्रह्मा सहित लोक, श्रमण-ब्राह्मण-देव-मनुष्य-सहित प्रजा को, स्वयं जान कर, साक्षात् कर, समझाते है। वह आदि-कल्याण, मध्य-कल्याण, पर्यवसान-कल्याण वाले धर्म का उपदेश करते हे। अर्थ-सहित, व्यंजन-सहित, केवल परिपूर्ण परिशुद्ध, ब्रह्म-चर्य को प्रकाशित करते हैं। उस धर्म को सुन कर तथागत के विषय में श्रद्धा लाभ करता है। वह उस श्रद्धा-लाभ से संयुक्त हो, यह सोचता है—गृह-वास जंजाल मैल का मार्ग है। प्रब्रज्या मैदान (= चैडा) है। इस एकान्त सर्वथा-परिपूर्ण, सर्वथा परिशुद्ध, खरादे शंख जैसे ब्रह्मचर्य का पालन, घर में बसते हुये के लिये सुकर नहीं है। क्यों न मैं सिर-दाढी मुँडा कर, काषयवस्त्र पहिन, घर से बेघर हो प्रब्रजित हो जाऊँ? सो वह दूसरे समय अपनी अल्प (= थोड़ी) भोग-राशि, या महा-भोग-राशि को छोड, अल्प-ज्ञाति-मंडल या महा-ज्ञाति-मंडल को छोड, सिर-दाढ़ी मुँडा, काषायवस्त्र पहिन, घर से बेघर हो, प्रब्रजित होता है। वह इस प्रकार प्रब्रजित हो, भिक्षुओं को शिक्षा, समान-जीविका को प्राप्त हो, प्राणातिपात छोड प्राण हिंसा से विरत होता है। दंड-त्यागी, शस्त्र-त्यागी, लज्जी, दयालु, सर्व-प्राणों सर्व-प्राण-भूतांे का हित और अनुकंपक हो, विहार करता है। अ-दिन्नादान (= चोरी) छोड़ दिन्नादायी (= दिये को लेने वाला), दत्त-प्रतिकांक्षी (= दिये का चाहने वाला), …पवित्रात्मा हो, विहरता है। अ-ब्रह्मचर्य को छोडकर ब्रह्मचारी, ग्राम्यधर्म मैथुन से विरत हो, आर-चारी (= दूर रहने वाला) होता है। मृषावाद को छोड, मृषावाद से विरत हो, सत्य-वादी, सत्य-संघ, लोक का अ-विसंवाद=विश्वास-पात्र ..होता है। पिशुन-वचन (= चुगली) छोड, पिशुन-वचन से विरत होता है, —यहाँ सुनकर इनके फोडने के लिये, वहाँ नहीं कहने वाला होता; या, वहाँ सुनकर उनके फोडने के लिये, यहाँ कहने वाला नहीं होता। इस प्रकार भिन्नों (= फूटों) को मिलाने वाला, मिले हुओ को भिन्न न करने वाला, एकता में प्रसन्न, एकता में रत, एकता में आनन्दित हो, समग्र (= एकता)-करणी वाणी का बोलने वाला होता है, परूष (= कटु) वचन को छोड, परूष वचन से विरत होता है। जो वह वाणी…कर्ण-सुखा, प्रेमणीया, हृदयंगमा, पौरी (= नागरिक, सभ्य) बहुजन-कान्ता=बहुजन-मनापा है; वैसी वाणी का बोलने वाला होता है। प्रलाप को छोडकर प्रलाप से विरत होता है। काल-वादी (= समय देखकर बोलने वाला), भूत (= यथार्थ) वादी, अर्थ-वादी, धर्म-वादी, विनय-वादी हो, तात्पर्य-सहित, पर्यन्त- साहित, अर्थ-सहित, निधान-वती वाणी का बोलने वाला होता है।

“वह बीज-समुदाय भूत-समुदाय के विनाश (= समारंभ) से विरत होता है। एकाहारी, रात को उपरत=विकाल (= मध्याह्नोत्तर) भोजन से विरत होता है। माला, गंध और विलेपन के धारण, मंडन और विभूषण से विरत होता है। उच्चशयन और महाशयन (= राजसी शय्या) से विरत होता है। जातरूप (= सोना)-रजत के प्रतिग्रहण से विरत होता है। कच्चे अनाज के प्रतिग्रहण (= लेना) से विरत होता है। कच्चा मांस लेने से विरत होता है। स्त्री-कुमारी ॰। दासी-दास ॰। भेढ-बकरी ॰। मुर्गी-सुअर ॰। हाथी-गाय ॰। घोडा-घोडी ॰। खेत-घर ॰। दूत बनकर जाने .. ॰। क्रय-विक्रय ॰। तराजू की ठगी, काँसे की ठगी, मान (= सेर मन आदि) की ठगी ॰। घूस, वंचना, जाल-साजी, कुटिल-योग ॰। छेदन, बध, बंधन, छापा मारने, आलोप (ग्राम आदि का विनाश) करने, डाका डालने ॰।

“वह शरीर पर के चीवर से, पेट के खाने से सन्तुष्ट होता है। वह जहाँ जहाँ जाता है, (अपना सामान) लिये ही जाता है; जैसे कि पक्षी जहाँ कहीं उडता है, अपने पत्र-भार सहित ही उडता है। इसी प्रकार भिक्षु शरीर के चीवर से, पेट के खाने से, सन्तुष्ट होता है। ॰ं वह इस प्रकार आर्यशील (= निर्दोष सदाचार की)-स्कंध (= राशि) से युक्त हो, अपने में (= अध्यात्म) निर्दोष सुख अनुभव करता है।

“वह चक्षु से रूप को देखकर, निमित्त (= लिंग, आकृति आदि) और अनुव्यंजन का ग्रहण करने वाला नहीं होता। चूँकि चक्षु इन्द्रिय को अ-रक्षित रख विहरने वाले को, राग द्वेष पाप=अ-कुशल धर्म उत्पन्न हो जाते हैं, इसलिये उसको रक्षित रखता (= संवर करता) है। चक्षु इन्द्रिय की रक्षा करता है=चक्षु इन्द्रिय में संवर ग्रहण करता है। वह श्रोत से शब्द सुनकर निमित्त और अनुव्यंजन का ग्रहण करने वाला नहीं होता ॰। घ्राण से गंध ग्रहण कर ॰। जिह्वा से रस ग्रहण कर ॰। काया से स्पर्श ग्रहण कर ॰। मन से धर्म ग्रहण कर ॰। इस प्रकार वह आर्य इन्द्रिय-संवर युक्त हो, अपने में निर्मल सुख को अनुभव करता है।

‘वह आने जाने में, जानकर करने वाला होता है। अवलोकन विलोकन में, संप्रजन्य-युक्त (= जानकर करने वाला) होता है। समेटने-फैलाने में संप्रजन्य-युक्त होता है। संघाटी पात्र-चीवर धारण करने में ॰। खाना-पीना भोजन-आस्वाद में ॰। पाखाना-पेशाब के काम में ॰। जाते-खडे होते, बैठते, सोते-जागते, बोलते-चुप रहते, संप्रजन्य-युक्त होता है। वह इस आर्य शील-स्कंध से युक्त, इस आर्य इन्द्रिय-संवर से युक्त, इस आर्य स्मृति-संप्रजन्य से युक्त हो, एकान्त में—अरण्य, वृक्ष के नीचे, पर्वत, कन्दरा, गिरि-गुहा, श्मशान, वन-प्रान्त, चैडे, या पुआल के गंज में—वास करता है। वह भोजन के पश्चात् आसन मार कर, काया को सीधा कर, स्मृति को सन्मुख रख बैठता है। वह लोक में (1) अभिध्या (= लोभ) को छोड़, अभिध्या-रहित-चित्त हो, विहरता है; चित्त को अभिध्या से परिशुद्ध करता है। (2) व्यापाद (= द्रोह) दोष को छोडकर, व्यापाद रहित चित्त से, सर्व प्राणियों का हितानुकत्पी हो, विहरता है; व्यापाद दोष से चित्त को परिशुद्ध करता है। (3) स्त्यानमृद्ध (= शरीर-मन के आलस) को छोड़, सत्यान-मृद्ध-रहित हो, आलोक-संज्ञा वाला, स्मृति, सम्प्रजन्य से युक्त हो विहरता है। औद्धत्य-कौकृत्य को छोड़ अन्-उद्धत हो भीतर से शान्त हो, विहरता है। (4) औद्धत्य-कौकृत्य से चित्त को परिशुद्ध करता है। (5) विचिकित्सा (= सन्देह) को छोड विचिकित्सा-रहित हो, कुशल (= उत्तम) धर्मों में विवाद रहित (= अकथंकथी) हो, विहरता है; चित्त को विचिकित्सा से परिशुद्ध करता है।

“वह इन पाँच नीवरणों को चित्त से छोड, उप-क्लेशों (= चित्त-मलों) को जान, (उनके) दुर्बल करने के लिये, कामों से पृथक् हो, अ-कुशल-धर्मो से पृथक् हो, स-वितर्क, स-विचार विवेक से उत्पन्न, प्रीति-सुखवाले प्रथम ध्यान को प्राप्त हो, विहरता है। ब्राह्मण! यह पद भी तथागत का पद कहा जाता है, वह (पद) भी तथागत से सेवित है, यह (पद) भी तथागत-रंजित है। किन्तु आर्य-श्रावक इतने ही विश्वास नहीं कर लेता-भगवान् सम्यक् संबुद्ध हैं, भगवान् का धर्म स्वाख्यात हैं, भगवान् का श्रावक-संघ सु-प्रतिपन्न है।

“और फिर ब्राह्मण? भिक्षु वितर्क और विचार के उपशांत होने पर, भीतर के संप्रसाद (= प्रसन्नता)=चित्त की एकाग्रता को प्राप्त हो, वितर्क-विचार-रहित, समाधि से उत्पन्न प्रीति-सुखवाले, द्वितीय-ध्यान को प्राप्त हो विहरता है। ब्राह्मण! यह पद भी तथागत का पद कहा जाता है, यह भी तथागत-सेवित है, यह भी तथागत-रंजित है। किन्तु आर्य-श्रावक इतने ही से विश्वास नहीं कर लेता—भगवान् सम्यक्-संबुद्ध हैं ॰।

“और फिर ब्राह्मण! भिक्षु प्रीति और विराग से उपेक्षक हो, स्मृति और संप्रजन्य से युक्त हो, काया से सुख को अनुभव करता विहरता है; जिसको (और) कि आर्य-जन अपेक्षक स्मृतिमान् सुख-विहारी कहते हैं, ऐसे तृतीय-ध्यान को प्राप्त हो, विहरता है। ब्राह्मण! यह पद भी तथागत-पद कहा जाता है ॰। किन्तु आर्य श्रावक इतने ही से विश्वास नहीं कर लेता ॰।

“और फिर ब्राह्मण! भिक्षु सुख और दुःख के विनाश से, सौमनस्य और दौर्मनस्य के पूर्व ही अस्त हो जाने से, दुःख-रहित, सुख-रहित उपेक्षक हो, स्मृति की परिशुद्धता-युक्त चतुर्थध्यान को प्राप्त हो विहरता है। यह भी ब्राह्मण! तथागत-पद कहा जाता है ॰। किन्तु आर्यश्रावक इतने ही से विश्वास नहीं कर लेता—भगवान् सम्यक् संबुद्ध हैं ॰।

“सो इस प्रकार चित्त के—परिशुद्ध=परि-अवदात, अंगण-रहित=उपक्लेश (= मल) रहित, मृदु हुये, काम-लायक, स्थिर=अचलता-प्राप्त=समाहित—हो जाने पर, पूर्वजन्मों की स्मृति के ज्ञान (= पूर्व-निवासाऽनुस्मृति-ज्ञान) के लिये चित्त को झुकाता है। फिर वह अनेक पूर्व-निवासों को स्मरण करने लगता है—जैसे ‘एक जन्म भी, दो जन्म भी, तीन जन्म भी, चार ॰, पाँच॰, छः॰, दस॰, बीस॰, तीस॰, चालीस॰, पचास॰, सौ॰, हजार॰, सौ हजार॰, अनेक सवर्त (= प्रलय) कल्प, अनेक विवर्त (= सृष्टि)कल्प, अनेक संवर्त-विवर्त-कल्प को भी, —इस नाम वाला, इस गोत्रवाला, इस वर्णवाला, इस आहारवाला, इस प्रकार के सुख दुःख को अनुभव करने वाला, इतनी आयु-पय्रन्त, मैं अमुक स्थान पर रहा। सो मैं वहाँ से च्युत हो, यहाँ उत्पन्न हुआं’ इस प्रकार आकार-साहित उद्देश्य-सहित अनेक किये गये निवासों को स्मरण करता है। यह भी ब्राह्मण! तथागत-पद कहा जाता है। ॰।

“सो इस प्रकार चित्त के परिशुद्ध ॰ समाहित होने पर प्राणियों के जन्म-मरण के ज्ञान (= च्युति-उत्पाद-ज्ञान) के लिये चित्त को झुकाता है। सो अ-मानुष विशुद्ध दिव्य चक्षु से अच्छे बुरे, सु-वर्ण, दुर्वर्ण, सुगत, दुर्गत, मरते, उत्पन्न होते, प्राणियों को देखता है। उनके कर्मो के साथ सत्वों को जानता है—‘यह जीव काय-दुश्चरित-सहित, वचन-दुश्चरित-सहित, मन-दुश्चरित-सहित थे, आर्यो के निन्दक (= उपवादक) मिथ्या-दृष्टिवाले, मिथ्यादृष्टि-सम्बन्धी कर्मो से युक्त थे। यह काया छोड, मरने के बाद अ-पास=दुर्गति=विनिपात=नर्क में उत्पन्न हुये हैं। और यह जीव (= सत्व) काय-सुचरित-सहित, वचन-सुचरित-सहित, मन-सुचरति-सहित थे, आर्यो के अ-निन्दक सम्यग्-दृष्टिवाले सम्यग्-दृष्टि-सम्बन्धी कर्मो से युक्त थे। यह काम से अलग हो…मरने के बाद सुगति=स्वर्गलोक को प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार अ-मानुष विशुद्ध दिव्य चक्षु से प्राणियों को ॰ देखता है। यह भी ब्राह्मा! तथागत-पद कहा जाता है। ॰।

“सो इस प्रकार चित्त के ॰ समाहित हो जाने पर आस्रव-क्षय-ज्ञान (= रागादि चित्त-मलों के नाश होने का ज्ञान) के लिये चित्त को झुकाता है। सो ‘यह दुःख है’ इसे यथार्थ से जानता है, ‘यह दुःख-मसुव्य है’ इसे यथार्थ से जानता है, ‘यह दुःख-निरोध है’ इसे यथार्थ से जानता है। ‘यह आस्रव हैं’ ॰। यह आस्रव-समुदय है’। यह आस्रव-निरोध है’ ॰। ‘यह आस्रव-निरोध-गामिनी-प्रतिपद् (= रागादि चित्त-मलों के नाश की ओर ले जाने वाला मार्ग) है’ ॰। यह भी ब्राह्मण! तथागत-पद कहा जाता है। ॰। ॰।

“इस प्रकार जानते, इस प्रकार देखते, उस (पुरूष) के चित्त को काम-आस्रव भी छोड देता है, भव-आस्रव भी ॰, अ-विद्या-आस्रव भी ॰। छोड देने (= विमुक्त हो जाने) पर, ‘छूट गया हूँ’ ऐसा ज्ञान होता है। ‘जन्म खतम हो गया, ब्रह्मचर्य पूरा हो गया, करना था, सो कर लिया, अब यहाँ के लिये कुछ नहीं’—यह भी जानता है। ब्राह्मण! यह भी तथागत-पद कहा जाता है ॰। इतने से ब्राह्मण! आर्य-श्रावक विश्वास करता है—भगवान् सम्यक्-संबुद्ध हैं ॰।

“इतने से ब्राह्मणस! हस्ति-पद की उपमा (हत्थि-पदोपम) विस्तारपूर्वक पूरी होती है।”

ऐसा कहने पर जानुश्रोणि ब्राह्मण ने भगवान् को यह कहा—

“आश्चर्य! भो गौतम!! आश्चर्य! भो गौतम!! ॰ मैं आप गौतम की शरण जाता हूँ, धर्म और भिक्षु-संघ की भी। आज से (मुझे) आप गौतम अंजलि-बद्ध उपासक धारण करें।