मज्झिम निकाय

20. वितक्क-सण्ठान-सुत्तन्त

ऐसा मैने सुना—

एक समय भगवान् श्रावस्ती में, अनाथपिंडिक के आराम जेतवन में विहार करते थे। वहाँ भगवान् ने भिक्षुओं को संबोधित (= आमंत्रित) किया—“भिक्षुओ!”

“भदन्त!”— (कह) उन भिक्षुओं ने भगवान् को उत्तर दिया।

भगवान् ने यह कहा—“भिक्षुओ! चित्त (के अनुशीलन) में लग्न भिक्षु को पाँच निमित्तों (= आकारों) का समय-समय पर मन से (चिन्तन) करना चाहिये। कौन से पाँच?—यहाँ भिक्षुओ! भिक्षु को जिस निमित्त को लेकर, निमित्त को मन में करके राग-द्वेष-मोह वाले पापक-अकुशल (= बुरे) वितर्क (= ख्याल) उत्पन्न होते हैं; भिक्षु ….उस निमित्त को (छोड) दूसरे कुशल-सम्बन्धी निमित्त को मन में करे। उसके उस निमित्त को (छोड़) दूसरे कुशल-सम्बन्धी निमित्त को मन में करते छन्द-सम्बन्धी ॰ अकुशल वितर्क नष्ट होते हैं, अस्त होते हैं; उनके नाश से अपने भीतर ही चित्त ठहरता है, स्थिर होता है, एकाग्र होता है, समाहित होता है। जैसे भिक्षुओ! चतुर पलगण्ढ (= राज) या पलगण्ड का अन्तेवासी (= शागिर्द) सूक्ष्म आणी (= चूर?) से मोटी आणी को निकाल ले (= अभिनीहरण करे)=अभिनिवर्जन करे; ऐसे ही भिक्षुओ! भिक्षु जिस निमित्त को लेकर ॰ समाहित होता है।

“भिक्षुओ! उस भिक्षु को उस निमित्त को (छोड) दूसरे कुशल-सम्बन्धी निमित्त को मन में करने पर भी यदि छन्द-सम्बन्धी ॰ अकुशल वितर्क उत्पन्न होते ही हें; तो भिक्षुओ! उस भिक्षु को उन वितर्को के आदिनव (= कारण, दुष्परिणाम) की जाँच करनी चाहिये—यह मेरे वितर्क अकुशल हैं, यह मेरे वितर्क सावद्य (= दोष-युक्त) हैं, यह मेरे वितर्क दुःख-विपाक (= दुःखद) हैं। उन वितर्को के आदिनव की परीक्षा करने पर उसके राग ॰ बुरे ख्याल नष्ट होते हैं, अस्त होते हैं; उनके नाश से चित्त अपने ही भीतर ठहरता है ॰। जैसे, कि भिक्षुओ! मंडन (= विभूषण) पसन्द करने वाला अल्पवयस्क तरूण पुरूष या स्त्री मरे साँप, या मरे कुत्ता, या आदमी के मुर्दे के कंठ में लग जाने से घृणा=जुगुप्सा करे; ऐसे ही भिक्षुओ! यदि उस भिक्षु को उस निमित्त को छोड ॰।

“भिक्षुओ! यदि उस भिक्षु को उन वितर्को के आदिनव को जाँचते हुये भी छन्द-सम्बन्धी ॰ अकुशल वितर्क उत्पन्न होते ही हैं, तो भिक्षुओ! उस भिक्षु को उन वितर्को को याद में लाना नहीं चाहिये, मन में न करना चाहिये। उन वितर्को को याद में न लाने से मन में न करने से, उसके राग वाले ॰ बुरे वितर्क (= ख्याल) नाश होते हैं, उनके नाश से चित्त अपने ही भीतर ठहरता है ॰। जैसे कि भिक्षुओ! नजर के सामने आने वाले रूपों के देखने का अनिच्छुक आँख-वाला आदमी (आँखों को) मूँद ले, या दूसरी ओर देखने लगे; ऐसे ही भिक्षुओ! यदि उस भिक्षु को उन वितर्कों को जाँचते हुये भी ॰।

“भिक्षुओ! यदि उस भिक्षु को उन वितर्कों (= ख्यालों) के मन में न लाने, मन में न करने से भी राग वाले ॰ बुरे ख्याल (= वितर्क) उत्पन्न होते ही हैं; तो भिक्षुओ! उस भिक्षु को उन वितर्कों (= ख्यालों) के संस्कार का संस्थानह (= आकार) मन में करना चाहिये। उन वितर्को के वितर्क-संस्कार-संस्थान (मात्र) को मन में लाने से उसके राग वाले ॰ बुरे ख्याल नाश होते है ॰। जैसे कि भिक्षुओ! पुरूष शीघ्र जाता हो, उसको ऐसा हो—काहे मैं शीघ्र जाता हूँ, क्यों न धीरे से चलूँ, फिर वह धीरे धीरे जाये। उसको ऐसा हो—क्यों मैं धीरे धीरे चलता हूँ, क्यों न मैं बैठ जाऊँ, फिर वह बैठ जाये। उसको ऐसा हो—क्यों मैं बैठा हूँ, क्यों न मैं लेट जाऊँ, फिर वह लेट जाये। ऐसे ही भिक्षुओ! वह पुरूष मोटे ईर्यापथ (= शारीरिक गति) से हटकर सूख्म ईर्यापथ को स्वीकार करे; ऐसे ही भिक्षुओ! यदि उस भिक्षु को उन वितर्कों के मन में न लाने ॰।

“भिक्षुओ! यदि उस भिक्षु को उन वितर्कों के वितर्क-संस्कार-संस्थान को मन में करने से भी ॰; तो भिक्षुओ! उस भिक्षु को दाँतो को दाँतों, पर रख कर, जिह्वा को तालू से चिपटा कर, चित्त से चित्त का निग्रह करना चाहिये, सन्तापन करना, निष्पीडन करना चाहिये, उसके ॰ निष्पीडन करने से, उसके रागवाले ॰ बुरे ख्याल नाश होते हैं ॰। जैसे भिक्षुओ! बलवान् पुरूष दुर्बल पुरूष को शिर से, या कन्धे से, पकड कर, निग्रहीत करे, निष्पीडित करे, सन्तापित करे; ऐसे ही भिक्षुओ! वह भिक्षु उन वितर्कों के वितर्क-संस्कार-संस्थान के मन में करने से भी ॰।

“चूंकि भिक्षुओ! भिक्षु को जिस निमित्त को लेकर, जिस निमित्त को मन में करके, राग-द्वेष-मोह वाले बुरे ख्याल पैदा होते हैं; उस निमित्त को छोड ॰ दूसरे ॰ निमित्त को मन में करने से ॰ चित्त ॰ समाहित होता है। उन वितर्कों के आदिनव (= दुष्परिणाम) की जाँच करने से राग ॰ वाले बुरे ख्याल नष्ट होते हैं ॰ चित्त ॰ समाहित होता है। उन वितर्कों के याद में न लाने से मन में न करने से ॰ चित्त समाहित होता है, उन वितर्कों के वितर्क-संस्कार-संस्थान को मन में करने से ॰ चित्त समाहित होता है। दाँतो को दाँतों पर रख कर ॰ निष्पीडन करने से ॰ चित्त समाहित होता है। भिक्षुओ! ऐसा भिक्षु वितर्क (= ख्याल) के नाना मार्गो को वश में करने वाला कहा जाता है। वह जिस वितर्क को चाहेगा, उसका वितर्क करेगा, जिस को नहीं चाहेगा नहीं वितर्क करेगा। (उसने) तृष्णा (रूपी) बंधन को हटा दिया; अच्छी प्रकार जान कर साक्षात् कर, दुःख का अन्त कर दिया।”

भगवान् ने यह कहा, सन्तुष्ट हो उन भिक्षुओं ने भगवान् के भाषण का अभिनन्दन किया।

(2—इति सीहनाद वग्ग 12)